Saturday, 31 May 2008
छद्म नाम से मोहब्बत मोबाइल हो गयी-हास्य व्यंग्य
उसने कहा-‘हां, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। वह अब किसी दूसरे को प्यार कर ही नहीं सकती।’
मित्र ने कहा-‘उसे आजमा कर देख लो। तुमने उसे मोबाइल का उपहार दिया है। तुम अपना दूसरा मोबाइल खरीदकर किसी छद्म नाम से प्रेम करके देख लो, और तमाम तरह के उपहार प्रलोभन दिखाओ तब पता चलेगा कि वह वास्तव में तुमसे प्रेम करती है कि नहीं।’
प्रेमी को अपने मित्र का सुझाव पसंद आया। उसने अपने मोबाइल पर छद्म नाम का दूसरा प्रेमी बनने का विचार किया। उसने कुछ दुकानों से उसके घर गिफ्ट भी भिजवाये जिनमें एक दूसरा मोबाइल भी था।
धीरे-धीरे उसने देखा था कि दूसरे मोबाइल से उसके दूसरे नंबर पर फोन अधिक आने लगे और पुराने मोबाइल से वही करता पर आते प्रेमिका ने तो बंद ही कर दिये। एक दिन उसने दूसरे प्रेमी के रूप में उससे पूछा-‘मैंने सुना है कि तुम्हारा कोई दूसरा प्रेमी भी है।’
प्रेमिका ने कहा-‘वह तो टाईम पास है। मैं सच्चा प्रेम तो तुमसे करती हूं। उसने तो मुझे बस एक मोबाइल उपहार में दिया है, तुम तो इतने सारे उपहार देते हो।’
प्रेमी ने कहा-‘पर तुमने मुझे अभी देखा ही नहीं तो कैसे कह सकती हो कि मैं सच्चे प्यार के लायक हूं?’
प्रेमिका ने कहा-‘‘अरे, आजकल किसी की शक्ल सूरत नहीं देखी जाती। बस, आदमी की नीयत देखी जाती है और वह केवल उपहार देने से ही पता लग जाती है।’
प्रेमी ने पूछा-‘‘फिर वह तुम्हारा प्रेमी! उस बिचारे का क्या होगा?
प्रेमिका ने कहा-‘कहां उस कंगाल की बात लेकर बैठ गये। उसको तो मैंने फोन करना ही बंद कर दिया है। उसके मोबाइल में दूसरा सिम डालकर मैंने अपनी बहिन को दे दिया है। उसको मैंने अपने घर का पता भी गलत दिया था। वह अब मुझसे मिल ही नहीं सकता।’
प्रेमी ने पूछा-‘‘तुम्हारा सही पता क्या है?’
प्रेमिका ने कहा-‘पहले मिल लो। जब अच्छी जान पहचान हो जायेगी। तब अपना असली पता दूंगी। मैंने अपने पुराने प्रेमी को ही यह पता इसलिए नहीं दिया कि वह मेरे समझ में नहीं आ रहा था। बड़ी मुश्किल से उसने कहीं से यह पुराना मोबाइल गिफ्ट में दिया था।’
प्रेमी की आंखों में आंसू आ गये। उस बिचारे ने तो नया मोबाइल गिफ्ट में दिया था। वह रोता हुआ अपने उसी मित्र के पास पहुंचा और उसे सारी कहानी सुनाई। मित्र ने कहा-‘अब तुम रो क्यों रहे हो। मैंने कहा था कि तुम धोखा खा रहे हो।‘
प्रेमी ने रोते हुए कहा-‘‘उसने मुझे धोखा दिया। इससे तो धोखे में रहना ही ठीक था। मुझे अपना छद्म नाम रखकर अपनी औकात नहीं देखना चाहिए थी। यह मोबाइल नहीं होता तो मेरी मोहब्बत भी मोबाइल नहीं होती।’
Sunday, 13 April 2008
देखने का होता है अपना-अपना नजरिया-हिंदी शायरी
देखने का होता है
नजरिया अपना-अपना
किसी के लिये कोई चीज हकीकत है
किसी के लिये होती है सपना
कोई कार पर कार बदलता है
कोई पैदल ही चलता
उसके लिए अपनी कार होती है सपना
कोई रहता है ऊंची इमारतों और
चमकदार महलों में
तो कोई ईंट और पत्थर ढोकर
उनका निर्माण कर मजदूर
अपनी झौंपड़ी में रहने चला जाता
उसके लिऐ महल में रहना होता एक सपना
इस जहां में जिसकी नींद अपनी है
और अपनी देह पर भी होता बस
सच के साथ होता है जिनका नाता
वह कभी भी नही देखते सपना
जो कभी नही होता अपना
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हम तो समझते थे उनको अपना
पता न था कि उनकी नजर में गैर हैं हम
अपने दिल का सच बताकर वह
छोड़ कर चलते बने
राह में अकेला खडे रह गए फिर हम
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Saturday, 12 April 2008
दिखावे के लिए अमन का पैगाम-हिंदी शायरी
हर चीज पर लिखा अपना नाम
जिंदगी भर करता इसके लिए काम
अपनी ख्वाहिशें पूरी करने के लिये
कई जगह टेकता अपना मत्था
ले जाता अपने घर के लोगो का जत्था
नख से शिख तक माया का मोह
मूंह में जपता राम
देखें हैं मस्तराम आवारा ने
इस दुनियां में कई लोग
जिम्मा है जो दुनिया बनाने वाले का
सब को अपनी जिंदगी बिताने के लिए
कुछ न कुछ देना सिक्कों के दाम
बंदा उसे समझ लेता अपना काम
एक-दो होता तो हम समझा लेते
यहां तो हर शख्स खुशफहमी में ले रहा
अपनी जिंदगी की सांस
सब मिल जाता है पर
फिर भी मन में रहती कुछ और पाने की फांस
ऐसे ही बिता देता जिंदगी
ऊपर वाले की माला जपता हर कोई
दिखावे के लिये देता अमन का पैगाम
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Saturday, 5 April 2008
जिन्दगी का सच कोई नहीं जानता-हिंदी शायरी
कुछ सवाल ही अपने आप में जवाब होते
लाजवाब हैं वह लोग जो
सवालों के जाल से दूर होते
किसी के सवाल को दो जवाब
कुछ का कुछ समझ जाये
तो फिर बवाल मच जाये
न दो जवाब तो भी मुसीबत
ऐसे में बेहतर हैं न किसी की सुने
न किसी को कुछ बताएं
जिन्दगी के कई सवाल ऐसे हैं
जिनके जवाब जो दिए जाते हैं
वह कभी नहीं होते
कुछ वहम तो कुछ धोखे होते
सच कोई नहीं जानता जिदगी का
जो जानते हैं वह सवालों से परे होते
जो देते हैं जवाब वह तो खुद ही भटके होते
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खडा हूँ खामोश इसलिए कि
भीड़ से पूछूंगा कोई सवाल तो
लोग अनाडी समझेंगे
किसी से समझ नहीं मिल सकती
दूंगा किसी के सवाल का जवाब तो
फिर कोई दूसरा सवाल करेंगे
इसलिए ओढ़ ली है खामोशी
मेरे कहने से कोई अपना रास्ता तो
लोग कभी बदलेंगे नहीं
वह तो अपने रास्ते वहमों और धोखे की
खदानों में ढूंढते हुए भटकेंगे
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Wednesday, 2 April 2008
माफ़ करना भाया-हिंदी शायरी
''भूल जाना मुझको
मेरे दिल में अब किसी और का चेहरा भाया
अब तो तुम्हारी जगह उसका नाम
मेरी जुबान पर आता
नहीं चल सकता तुम्हारे साथ अधिक
हालांकि मैंने अपने दिल को खूब समझाया''
नीचे उसने लिखा
''देखो अप्रैल फूल बनाया''
दूसरे दिन जवाब आया
''तुम्हारे सन्देश से
उड़ गए थे होश हमारे
अप्रैल फूल तो लिखा बाद में
नजर आया
अकेले होने की टेंशन में
अपने वेटिंग में खडे अपने एक
दोस्त को प्रेम सन्देश भिजवाया
अब तो वहाँ से स्वीकृति का सन्देश आया
अब तुम हमें माफ़ करना भाया''
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Sunday, 30 March 2008
तरक्की नाम की चिडिया संवेदनशील हो गयी है-हिंदी शायरी
जिसके उड़ने की चर्चा आम हो गयी है
जमीन पर कभी आती क्यों नहीं
या ऊंची इमारतों में रहने की आदी हो गयी हैं
डरती होगी नीचे उतरने में
क्योंकि दिखाई देंगे
भूखे नंगे लोग रास्ते में
रोटी और प्यास से तड़पते हुए
बीमार अस्पताल के बाहर टपकते हुए
बेकार युवकों का झुंड
नौकरी के तलाश में भटकते हुए
आम आदमी के पाँव सड़क के
गड्ढों में अटकते हुए
शायद यह सब नहीं चाहती देखना
तरक्की नाम की चिडिया संवेदनशील हो गयी है
Saturday, 22 March 2008
आदमी के मिजाज नहीं बदलते-हिंदी शायरी
पेडों पर पते चले आते
और पतझड़ में बिछड़ जाते हैं
कभी पेडों को पते आने पर
खुश होते नहीं देखा
उनके बिछड़ने पर रोते नहीं देखा
पर इंसानों की आदत हैं
हर मौसम में रोना
इसलिए उसकी जिन्दगी में
हमेशा पतझड़ ही देख पाते हैं
जिनके यहाँ आता है बसंत
वह भी उसे छिपाते हैं
भय के साथ सोता
आशंकाओं के साथ उठता इंसान
इसलिए कभी खुश नहीं देख पाते हैं
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मौसम की तरह
जिन्दगी के दौर भी बदलते हैं
पर इंसान के ख्यालों में
कभी नहीं आता बदलाव
इसलिए उसकी जिन्दगी के
मिजाज कभी नहीं बदलते हैं
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Friday, 21 March 2008
असल में दानवता सब जगह खेले-हिंदी शायरी
वैभव को दी थी चुनौती
तपस्या से मिली थी उसे शक्ति
पर आज तो वैभव की रौशनी
देखकर सब अंधे हो जाते हैं
उसकी शक्ति के आगे सब लाचार नजर आते हैं
चकाचौंध में युवक-युवतियों की आसक्ति
मन में व्यसनों की चादर ओढे हैं
होलिका भी ऐसी चादर क्या लाती
जो धीरे-धीरे आज के प्रह्लादों को जलाती
भक्ति की जगह पैदा करती आसक्ति
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देवताओं के चमत्कार के
नाम पर सब जगह लगते हैं मेले
पर वहाँ भी पहुंचते दानवों के चेले
देवता की मूर्ति हो या प्रसाद
बिकतीं हैं मंहगे
वाहन खडा करने पर लेते दूना किराया
अन्दर हैं देवता और बाहर है दानव उससे सवाया
देवत्व तो नाम हो जाता है
असल में तो दानवता सब जगह खेले
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Saturday, 15 March 2008
बिना यकीन के दुनिया चल नहीं सकती-हिंदी शायरी
उन पर यकीन कर लिया
उनकी नीयत से मुहँ फेर लिया
जो फेरा उन्होंने मुहँ
अपने किये हुए वादे भूल गए
हम फिर भी करते रहे उम्मीद
पर कभी वादे भी पूरे किये जाते हैं
इरादे कितने भी हों
बिना मतलब के काम भला
इस जमाने में कभी किये जाते हैं
इस जमाने में विश्वास के साथ
कई जगह धोखा भी होगा
हमने यह सच देख लिया
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यकीन कर कई बार
जिन्दगी में हारे हैं
पर फिर भी नहीं टूटता
यकीन करने का सिलसिला
मजबूरी के मारे हैं
बिना यकीन के यह दुनिया
चल ही नहीं सकती
क्योंकि कई लोगों का चलता है
दूसरों को धोखा देने से काम
यही सोचकर हम हारे हैं
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Friday, 14 March 2008
पहले अपना इलाज करवा लो-हिंदी शायरी
''अपने खून की स्याही से
यह प्रेम पत्र लिख रहा हूँ
इसे स्याही न समझना
अपना इश्क अपने दिल के टुकड़े पर
लिख कर इजहार कर रहा हूँ
इसे कागज़ मत समझना
तुम मुझे प्रेम कर आजमा लो''
लौटती डाक से जवाब आया
''अपना खून चेक करवा लो
ख़त में सब लिखा हुआ
नीली स्याही जैसा लगता है
हस्ताक्षर हैं काली स्याही जैसे
ताज्जुब है कि तुम्हारा दिल भी
कागज की तरह लगता है
दूसरा ख़त बाद में लिखना
पहले अपना इलाज करवा लो
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Tuesday, 11 March 2008
मामला दहेज़ का है-हिंदी शायरी
कहा जाता था कि
माता-पिता भगवान् होते हैं
अब तो ऐसा लगता है सबके लिए
बच्चे एक तरह से सजावटी पकवान होते हैं
बेटी को तो गिरा देते हैं गर्भ में ही
जवान बेटे की शादी में भी
चाहते हैं ढेर सारा दहेज़
कर देते हैं उसे बूढा
उसकी ख्वाहिशों का करते हैं कत्ल
तीस की उम्र पार कर भी उनके बेटे
उनकी नजर में गबरू जवान होते हैं
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दहेज़ की लालच में
नहीं कराते माता-पिता
अपने लड़के की नहीं कराते शादी
उम्र निकलती जाती हैं
माँ-बाप की नजर रहती है माल पर
बेटा इधर-उधर नजरें मारता है
कहीं कहीं करता छेड़छाड़
कहीं करता मारधाड़
कहीं जख्म करता कहीं पाता
करता समाज और अपनी बर्बादी
मामला केवल दहेज़ का ही है
मिले तो, ठीक नहीं तो
निष्ठुर माता-पिता नहीं करते लड़के की शादी
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Sunday, 9 March 2008
फिर भी तमाशा चल रहा है-हिंदी शायरी
तेज रौशनी से लोगों की आँखें
चकाचौंध में बंद हो जातीं
पूरे समाज का कदम बहक रहा है
सड़कों पर हो गयी है खामोशी
तमाशों का काम अब बंद कमरों में हो रहा है
मदारी अब रास्ते में आवाज देकर
नहीं बुलाता लोगों की भीड़
बन्दर-बंदरिया का नाच देखने के लिए
इंसानी बुत तैयार हैं
अपने करतब दिखाने के लिए
अब मशीने आवाज करतीं हैं
लोगों को बुलाने के लिए
शोर मचता है कई दिन पहले
कहते हैं शो पर
तमाशा चल रहा है
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अपने दुख भूल जाना चाहिए
जब इतने तमाशे दिखाए जा रहे हैं
पर आम आदमी के दुख दर्दों का
सिलसिला फिर भी नहीं थमता
किसी भूखे का पेट बिना रोटी के बिना
नहीं भर सकता
रोगी का इलाज बिना दवा के नहीं हो सकता
ताज्जुब होता है यह देखकर
फिर भी आजकल के मदारी
तमाशों से घर भरते जा रहे हैं
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Saturday, 8 March 2008
जब तक रहेंगे असलियत से अनजाने-हिंदी शायरी
खाली हैं प्यार से दिल,
आंखों से लगते आंसुओं को छलकाने
मन में उदासियों का छाया है ढेर
खुशियों को ढूँढ़ते हैं टके में सेर
खुश होने के मतलब से अनजाने
कोई पीता है शराब के जाम
कोई ढूँढता अय्याशी के काम
नाचने-गाने की महफ़िल में ढूंढते हैं
जिन्दगी की असलियत के पैमाने
फिर भी इस जहाँ में कोई खुश नहीं दिखता
कोई माने या माने
जो दिल में न हो वह
बाजार में कहाँ मिल सकता है
कितनी भी कोशिश कर लें
नहीं मिल सकता चैन कभी
जब तक असलियत से रहेंगे अनजाने
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सोहब्बत का असर होता है
बदनाम गलियों में जाने के लिए
भला क्या काम होता है
झूठ की चमक में खोये हैं सब
सच का काम तमाम होता है
फिर शिकायत जमाने की क्यों करते हो
हमारी आंखों के सामने ही
यकीन का कत्ल सरेआम होता है
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बंद किये हैं जिन्होंने सोच के दरवाजे-हिंदी शायरी
किसीका दर्द क्यों सुनेंगे, चाहे बजाओ बाजे
अपने दिल में बस अपना ख्याल ही उनको
कर जाते हैं दूसरों से हमेशा झूठे वादे
अपने मतलब के लिए चाहे जहाँ चले जाते
न हो कोई वास्ता तो, पुराने जख्म कर देते ताजे
ऐसे लोगों से क्या उम्मीद और भरोसा करना
जिन्होंने कर रखें बंद, अपने विश्वास के दरवाजे
Friday, 7 March 2008
फिर भी नफ़रत होती नहीं कम -हिंदी शायरी
वादा किया था हमने उनसे
जिन रास्तों पर होगी उनकी बस्ती
कभी नहीं गुजरेंगे उनसे हम
उनके पास नहीं रखेंगे कभी कदम
चलने के लिए और भी राहें है
उसी पर हम चलते जाते
फिर भी राह पर टकरा जाते
हम करते उनको सलाम तो
वह मुहँ फेर चले जाते
दुनिया में प्यार की बात कितनी भी कर लो
फिर भी नफरत कभी होती नहीं कम
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चले जाते हैं मुहँ फेर कर
मिलते हैं जब राह में
क्योंकि कभी उन्होने किये थे वादे
जिन्हें पूरा नहीं किया था
वह सब भूलकर बढ़ें आगें
हमें उनसे अब कोई शिकायत नहीं
पर कौन तोड़ेगा यह वहम उनका कि
उनके वादे पर कभी हमें यकीन भी किया था।
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Tuesday, 4 March 2008
फिर क्यों मन मचलता-हिंदी शायरी
कहीं चले जाने को करता
कहीं और जाकर नये दोस्त
ढूँढने के लिए मचलता
पर यह है उसकी चंचलता
जो सच यहाँ है
वही वहाँ भी है
धोखे और वफ़ा तो कहीं भी हो सकते
जगह बदलने से हालात नही बदल सकते
सच जानते हुए भी मन क्यों मचलता
Sunday, 2 March 2008
तब बदल जायेगा परिदृश्य-हिंदी शायरी
रात्रि के शीतल पलों में
चन्द्रमा की हल्की रोशनी में
देह पर धवल वस्त्र
चारों और बिखर रही इत्र की खुशबू
हाथों में गुलाब लिए
प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए निकला है वह
कितना सुन्दर लगता है दृश्य
पर जब सूरज चमकेगा
अपनी अग्नि से धरती को प्रज्जवलित करेगा
अपनी जिम्मदारियों का बोझ उठाएगा
तब निकलेगा उसका पसीना
बदल जायेगा परिदृश्य
दीवारों पर लिखे सत्य पढे नहीं है-हिंदी शायरी
क्योंकि अब लोगों के दिलों में अब
उनके लिए कोई जगह बची नहीं है
भाई और भाई के बीच
अब कोई दीवार नहीं खड़ी नही रह सकती
क्योंकि रिश्ता रह गया है
जैसे हवा में लटकी तख्ती
नफ़रत जैसी कोई बात नहीं है
क्योंकि समय के कमी की वजह से
कभी प्यार शुरू हुआ ही नहीं है
इधर-उधर लोग उन रिश्तों की
शिकायत करते नजर आते
जो कभी शुरू ही नहीं हो पाते
कहने वाले कहते हैं कि
जो चूल्हे के पास वही होता है दिल में
चूल्हे बनवा दिए जिनके अलग
फिर उनका इन्तजार क्यों करते हैं
शायद उन्होने इतिहास की
दीवारों पर लिखे सत्य पढे नहीं हैं
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Saturday, 1 March 2008
वह एक है, पर नाम अनेक-हिंदी शायरी
उन्होने ढोल बजाने वालों का घर बता दिया
जो पहुंचे वहाँ सुना शोर
तो हमने मालिक को भुला दिया
वह है एक पर नाम अनेक
डर था की कहीं हम लें नाम उनका
कहीं और अधिक शोर न मच जाये
अगर कहीं हमने भीड़ से अलग नाम लिया
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अपने घर का बजट बनाने से क्या फायदा-हिंदी शायरी
गृहणी ने गृहस्वामी से कहा
''आज मैंने महिलाओं की
एक किताब में पढा कि
घर का खर्च भी बजट बनाकर करना चाहिए''
गृहस्वामी ने कहा
''बजट बनाने के लिए भी
कागज़ और पेन चाहिए
जो अपने बजट में नहीं आ सकतीं
पड़ोस से उधार लेकर अख़बार और किताब
जो तुम पढ़कर बढाती हो ज्ञान
उसका भी नहीं हो सकता इंतजाम
मेरे पास समय नहीं है काम से फुरसत
तुम अगर बजट बनाओगी
बाजार तो जाना है मुझे
तुम तो नहीं जाओगी
तुम्हारे बजट से बाजार नहीं चलता
उसके बजट से हमारा घर चलता
इसलिए यह सब भूल जाओ
बजट बनाने का शौक नहीं हो सकता पूरा
उसके लिए जगह भी वैसी ही चाहिए
अपने लिए बनाया तो, हमें क्या फायदा
ऐसी जगह बैठें
जहाँ बनाएं हम और जमाने को उस पर चलना चाहिए
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