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Sunday, 13 April 2008

देखने का होता है अपना-अपना नजरिया-हिंदी शायरी


देखने का होता है
नजरिया अपना-अपना
किसी के लिये कोई चीज हकीकत है
किसी के लिये होती है सपना
कोई कार पर कार बदलता है
कोई पैदल ही चलता
उसके लिए अपनी कार होती है सपना
कोई रहता है ऊंची इमारतों और
चमकदार महलों में
तो कोई ईंट और पत्थर ढोकर
उनका निर्माण कर मजदूर
अपनी झौंपड़ी में रहने चला जाता
उसके लिऐ महल में रहना होता एक सपना
इस जहां में जिसकी नींद अपनी है
और अपनी देह पर भी होता बस
सच के साथ होता है जिनका नाता
वह कभी भी नही देखते सपना
जो कभी नही होता अपना
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हम तो समझते थे उनको अपना
पता न था कि उनकी नजर में गैर हैं हम
अपने दिल का सच बताकर वह
छोड़ कर चलते बने
राह में अकेला खडे रह गए फिर हम
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Friday, 21 March 2008

असल में दानवता सब जगह खेले-हिंदी शायरी

प्रहलाद ने तो की थी भक्ति
वैभव को दी थी चुनौती
तपस्या से मिली थी उसे शक्ति
पर आज तो वैभव की रौशनी
देखकर सब अंधे हो जाते हैं
उसकी शक्ति के आगे सब लाचार नजर आते हैं
चकाचौंध में युवक-युवतियों की आसक्ति
मन में व्यसनों की चादर ओढे हैं
होलिका भी ऐसी चादर क्या लाती
जो धीरे-धीरे आज के प्रह्लादों को जलाती
भक्ति की जगह पैदा करती आसक्ति
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देवताओं के चमत्कार के
नाम पर सब जगह लगते हैं मेले
पर वहाँ भी पहुंचते दानवों के चेले
देवता की मूर्ति हो या प्रसाद
बिकतीं हैं मंहगे
वाहन खडा करने पर लेते दूना किराया
अन्दर हैं देवता और बाहर है दानव उससे सवाया
देवत्व तो नाम हो जाता है
असल में तो दानवता सब जगह खेले
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Tuesday, 4 March 2008

फिर क्यों मन मचलता-हिंदी शायरी

कभी मन उदास हो कर
कहीं चले जाने को करता
कहीं और जाकर नये दोस्त
ढूँढने के लिए मचलता
पर यह है उसकी चंचलता

जो सच यहाँ है
वही वहाँ भी है
धोखे और वफ़ा तो कहीं भी हो सकते
जगह बदलने से हालात नही बदल सकते
सच जानते हुए भी मन क्यों मचलता

Saturday, 1 March 2008

स्वार्थों के होते मेहमान-हिंदी शायरी

चेहरे पर है दिखावटी मुस्कान
नहीं होता नीयत का भान
बदन पर हैं जगमगाते वस्त्र धारण किए
दिल में काली नियत लिए
भरोसे के लिए निकल रहे हैं
शब्द जुबान से निरंतर
विश्वास और धोखे का मालुम नहीं अन्तर
मन की आंखों से पढोगे जब उनको
उनके शब्दों के अर्थों का अर्थ समझ में आयेगा
भरोसे और वादों का वजन कम हो जायेगा
झूठी दिखेगी उनकी शान
वह तुम्हारे नहीं
अपने स्वार्थों के होते मेहमान
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Thursday, 28 February 2008

अगर हिट होता है तो बेहूदा भी लिख जाएं-हिंदी शायरी

अगर हिट होता है तो बेहूदा भी लिख जाएं
और चारों तरफ से वाह-वाह जुटाएँ
जैसा पढ़ते हैं पाठक वैसा ही लिखें
जिससे प्यार मिलता हो वैसा दिखें
अगर मन में हैं कूड़ा तो
सोने जैसा कहाँ लिख पायेंगे
लिखना जरूरी है तो लिखते जायेंगे
भले ही कुछ लोगों को पसंद न आयें

सभी लगें है अपना सम्मान बढाने में
अपने आसपास भीड़ जुटाने में
हम क्यों पीछे रह जाएं
जो कहलाते है समाज के शिखर
एक नंबर की दौलत तो कम होती है
उनके पास
करते हैं वह भी दो नंबर से आस
अन्दर होता है सब कुछ काला
चमकते सिक्के लगते हैं बाहर दिखाने
फिर हम क्यों चूकें अपने निशाने


मन में आये जैसा लिखों
पर अपने अन्दर अपने को साफ दिखों
पढ़ने के लिए अच्छा साहित्य ही लायें
दुनिया ढूँढती पढ़ने के लिए व्यस्क सामग्री
तुम चाहे लिख दो
पर अपने बालकों को बाल साहित्य और
बडों को सत् साहित्य पढाएँ
अपने लिखे से तुम दुनिया नहीं बदल सकते
अच्छा लिखा तब तक कोई नहीं पढेगा
जब तक तुम बाजार में सस्ते नहीं बिक सकते
बेहूदा लिखने से परहेज नहीं करना
अगर मंहगे में बिक सकते
मन की बात लिखने के लिए
अपनी महफ़िल अलग सजाएं
मस्तराम 'आवारा की तरह अकेले
रहने के लिए तैयार हो जाएं
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Wednesday, 27 February 2008

खाने-खिलाने का चक्कर आदमी को बना देता है कोल्हू का बैल-हिन्दी शायरी

पल भर की खुशी के लिए
पूरी जिन्दगी दाव पर लगा देते हैं
देना है जन्मदिन, शादी और तेरहवीं पर
लोगों को खाने की दावत
जिनका खाया है उनसे न हो अदावत
इस सोच में
जिन्दगी के खूबसूरत पल गँवा देते हैं
खाने-खिलाने के चक्कर
आदमी को कोल्हू का बैल बना देते हैं
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प्यार है तो बहानों की क्या जरूरत
व्यापार है तो शर्माने की क्या जरूरत
संकोच के साथ जीवन नहीं चलता
खेल हो या जंग
डरने वालों से काम नहीं बनता
बदलाव के लिए होती बहादुरी की जरूरत

Monday, 25 February 2008

क्या करेंगे कागज़ पर पते लेकर-हिंदी शायरी

तेज आंधी ने उडाया तो
आंधी ने इंसान की आँखों में
घर बना लिया
वक्त के घुमते पहिये के साथ
जो पाँव से कुचला जाता है
वह उठकर सिर तक भी आ सकता है
उसने यह बता दिया
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घर से लेकर निकले थे
उनके नये घर का पता लेकर
गुम हो गया कागज़ रास्ते पर
भटकते रहे सड़कों पर और लौटे घर
सोचा-'नहीं मिला तो कोई बात नहीं
इस बार नहीं तो अगली बार मिलेंगे
दुबारा निकलेंगे पता लेकर'

सच है
इंसानों के पते होते हैं
पतों पर होते इंसान
अगर वह दिल में नहीं बसते
तो क्या करेंगे कागज़ पर पते लेकर

Sunday, 24 February 2008

उसे नहीं देख पाता कोई दिल-हिन्दी शायरी

जब बड़े लोगों के सजती है महफ़िल
तड़पते हैं छोटे लोगों के दिल
इंसानों में जब होता है अन्तर
तब कोई काम नहीं करता शांति का मंतर
देशों की जंग दिखती है
पर आदमी जो पल-पल लड़ता मन में
उसमें तो नैतिकता पिसती है
आर्थिक संपन्नता और विपन्नता के बीच
पलती है नफरत
उसे नहीं देख पाता कोई दिल
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आशिक ने कहा
''मैं तुम्हें चाहता हू
तुमसे लगा है मेरा दिल''
माशुका बोली
''क्या इतना सस्ता समझ रखा है
तभी मान सकती हूँ तुम्हें
पहले चुकाओं
साल भर तक
मेरे मोबाइल, मेकअप और मोटर का बिल''
आशिक गया हिल
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भरोसा और विज्ञापन-हिन्दी शायरी

अब भरोसा ढूँढने की चीज नहीं रही
टीवी चैनल और पत्र-पत्रिकाएँ
पढ़ते जाओ
ढेर सारी चीजें खरीदो
और भरोसे के साथ हो जाओ
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हमने जो उनसे कहा
''हम पर करो भरोसा
वक्त पर काम आयेंगे''
उन्होंने कहा
''आप वक्त पर किसी के काम आए
ऐसा क्या प्रमाण लाएंगे
हमने टीवी चैनल पर या अखबार में
कहीं आपका नाम नहीं देखा
आदमी के ख़ुद ने कहने से कुछ नहीं होता
उसका विज्ञापन होना भी जरूरी है
अगर ऐसा नहीं है तो
हम भी भरोसा कहाँ कर पायेंगे
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Saturday, 23 February 2008

तब तक प्यार का इन्तजार कर-हिन्दी शायरी

आसमान से कोई हूर आकर
तुझे प्यार करेगी इसका इंतजार न कर
इस जमीन पर नजर रख कर चल
यहाँ भी हूरें बहुत है
पहले अपने दिल से प्यार का इजहार कर
खुले आकाश में कोई ऐसी जगह का
ठिकाना का पता किसी को नहीं है
जहाँ कोई आदमी की हस्ती हो
जहाँ हूरों की बस्ती हो
प्यार पाने के लिए कहीं मिन्नतें मांगने की
कोई जरूरत नहीं
दिल में पैदा होगा तभी मिलेगा और कहीं
और कोई तो तभी करे
पहले तू अपने से इकरार कर
ढूंढ रहे हैं लोग प्यार की दौलत कौडियों के मोल
बोलते हैं झूठ के बोल
सच्चे प्यार की कमी है ज़माने में
पढ़ते हैं जो बहुत ज्ञान की किताबें
वही लगे हैं लोगों को प्यार के नाम पर भरमाने में
तू भीड़ से परे हटकर
अपने दिल में जहाँ कर देख
किस कोने में प्यार रहता है
कहाँ हमदर्दी का दरिया बहता है
फिर चल उस राह पर
जिसका पता तू जानता हो
जब तक देख न ले अपने आप को
तब तक प्यार का इन्तजार कर

आदमी में विश्वास कहाँ है-हिन्दी शायरी

विश्वास टूटता कहाँ है
जो टूटता वह विश्वास कहाँ है
देने वाले ने काम के लिए दो हाथ
चलने के लिए दो पाँव
देखने के लिए आँखें
सुनने के लिए कान
सांस लेने के लिए नाक
विचार के लिए दी अक्ल
पर आदमी में विश्वास कहाँ है

आदमी अपने हाथ पेट पर लगाए बैठा रहता
पाँव उसी तरफ झुकाए
सुनता केवल उसके स्वर
सूंघता केवल अन्दर से नाक की तरफ
आती हुए भोजन की खुशबू
सोचता रहता पर रोटी भरने के लिए
फुरसत पाए तो सुस्ताते हुए जपता नाम
ढोल और शंख बजाकर चीखता
पर आदमी में विश्वास कहाँ है
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