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Saturday, 7 June 2008

बेपरवाह होकर चलते वही अपनी मंजिल पाते-हिंदी शायरी

अपनी इज्जत की खातिर लोग
कभी दिखाते हैं दरियादिली तो
कभी तंगदिल हो जाते
खुशफहमी में जीते हैं सभी इंसान कि
दुनियां वाले उनकी तरफ ही देखते है
दूसरों की नजरों की परवाह करते
अपनी राह से हटा लेते नजर
इसलिये चलते चलते ही भटक जाते

देखते हैं मस्तराम ‘आवारा’
अपनी नजरों से अपने को देख सकें
ऐसा कोई आईना बना नहीं
दूसरों की नजर का ख्याल कर
क्यों अपने अंदाज बदल जाते हो
अपनी राह-दर-राह से भटके जाते हो
यह गलतफहमी है कि
जैसा हम अपने को देखते हैं
वैसे ही हमें देखता सारा जमाना
भला कहीं हम किसी को उसकी नजरों देख पाते
अपनी आंखों पर चढ़ा है जैसी अक्ल का
वैसा ही दृश्य देख कर अपना ख्याल बनाते
यहां सभी खोय हैं अपने में
कौन किसको देखता है
दूसरों के ख्याल की परवाह कर
सभी तबाही की राह चले जाते
जो हैं बेपरवाह वही अपनी मंजिल तक पहुंच पाते

Saturday, 8 March 2008

बंद किये हैं जिन्होंने सोच के दरवाजे-हिंदी शायरी

बंद किये हैं जिन्होंने अपनी सोच के दरवाजे
किसीका दर्द क्यों सुनेंगे, चाहे बजाओ बाजे
अपने दिल में बस अपना ख्याल ही उनको
कर जाते हैं दूसरों से हमेशा झूठे वादे
अपने मतलब के लिए चाहे जहाँ चले जाते
न हो कोई वास्ता तो, पुराने जख्म कर देते ताजे
ऐसे लोगों से क्या उम्मीद और भरोसा करना
जिन्होंने कर रखें बंद, अपने विश्वास के दरवाजे

Tuesday, 4 March 2008

फिर क्यों मन मचलता-हिंदी शायरी

कभी मन उदास हो कर
कहीं चले जाने को करता
कहीं और जाकर नये दोस्त
ढूँढने के लिए मचलता
पर यह है उसकी चंचलता

जो सच यहाँ है
वही वहाँ भी है
धोखे और वफ़ा तो कहीं भी हो सकते
जगह बदलने से हालात नही बदल सकते
सच जानते हुए भी मन क्यों मचलता

Sunday, 2 March 2008

तब बदल जायेगा परिदृश्य-हिंदी शायरी


रात्रि के शीतल पलों में
चन्द्रमा की हल्की रोशनी में
देह पर धवल वस्त्र
चारों और बिखर रही इत्र की खुशबू
हाथों में गुलाब लिए
प्रेम की अभिव्यक्ति के लिए निकला है वह
कितना सुन्दर लगता है दृश्य
पर जब सूरज चमकेगा
अपनी अग्नि से धरती को प्रज्जवलित करेगा
अपनी जिम्मदारियों का बोझ उठाएगा
तब निकलेगा उसका पसीना
बदल जायेगा परिदृश्य

Saturday, 1 March 2008

अपने घर का बजट बनाने से क्या फायदा-हिंदी शायरी

गृहणी ने गृहस्वामी से कहा

''आज मैंने महिलाओं की

एक किताब में पढा कि

घर का खर्च भी बजट बनाकर करना चाहिए''

गृहस्वामी ने कहा

''बजट बनाने के लिए भी

कागज़ और पेन चाहिए

जो अपने बजट में नहीं आ सकतीं

पड़ोस से उधार लेकर अख़बार और किताब

जो तुम पढ़कर बढाती हो ज्ञान

उसका भी नहीं हो सकता इंतजाम

मेरे पास समय नहीं है काम से फुरसत

तुम अगर बजट बनाओगी

बाजार तो जाना है मुझे

तुम तो नहीं जाओगी

तुम्हारे बजट से बाजार नहीं चलता

उसके बजट से हमारा घर चलता

इसलिए यह सब भूल जाओ

बजट बनाने का शौक नहीं हो सकता पूरा

उसके लिए जगह भी वैसी ही चाहिए

अपने लिए बनाया तो, हमें क्या फायदा

ऐसी जगह बैठें

जहाँ बनाएं हम और जमाने को उस पर चलना चाहिए

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स्वार्थों के होते मेहमान-हिंदी शायरी

चेहरे पर है दिखावटी मुस्कान
नहीं होता नीयत का भान
बदन पर हैं जगमगाते वस्त्र धारण किए
दिल में काली नियत लिए
भरोसे के लिए निकल रहे हैं
शब्द जुबान से निरंतर
विश्वास और धोखे का मालुम नहीं अन्तर
मन की आंखों से पढोगे जब उनको
उनके शब्दों के अर्थों का अर्थ समझ में आयेगा
भरोसे और वादों का वजन कम हो जायेगा
झूठी दिखेगी उनकी शान
वह तुम्हारे नहीं
अपने स्वार्थों के होते मेहमान
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Friday, 29 February 2008

हाथी उत्पात मचा रहे हैं-हिंदी शायरी

जंगल में भोले भाले हाथी
इसलिए उत्पात मचा रहे हैं
क्योंकि उनके घरों को
सफ़ेद हाथी छोटा बना रहे हैं
सदियों से रहते आये मनुष्यों के साथ
अपने भोजन को लुटता तो देख पाते
पर चर जाते सफ़ेद हाथी उसे
वह दृष्टि पथ में नहीं आते
जंगली हाथी उसे ढूँढने के लिए ही
आ रहे हैं जंगलों से बाहर आ रहे हैं
''आज ख़तरा है हमें
कल तुम भी आओगे इसके दायरे में''
आदमी पर हमला कर यह बता रहे हैं
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Thursday, 28 February 2008

अगर हिट होता है तो बेहूदा भी लिख जाएं-हिंदी शायरी

अगर हिट होता है तो बेहूदा भी लिख जाएं
और चारों तरफ से वाह-वाह जुटाएँ
जैसा पढ़ते हैं पाठक वैसा ही लिखें
जिससे प्यार मिलता हो वैसा दिखें
अगर मन में हैं कूड़ा तो
सोने जैसा कहाँ लिख पायेंगे
लिखना जरूरी है तो लिखते जायेंगे
भले ही कुछ लोगों को पसंद न आयें

सभी लगें है अपना सम्मान बढाने में
अपने आसपास भीड़ जुटाने में
हम क्यों पीछे रह जाएं
जो कहलाते है समाज के शिखर
एक नंबर की दौलत तो कम होती है
उनके पास
करते हैं वह भी दो नंबर से आस
अन्दर होता है सब कुछ काला
चमकते सिक्के लगते हैं बाहर दिखाने
फिर हम क्यों चूकें अपने निशाने


मन में आये जैसा लिखों
पर अपने अन्दर अपने को साफ दिखों
पढ़ने के लिए अच्छा साहित्य ही लायें
दुनिया ढूँढती पढ़ने के लिए व्यस्क सामग्री
तुम चाहे लिख दो
पर अपने बालकों को बाल साहित्य और
बडों को सत् साहित्य पढाएँ
अपने लिखे से तुम दुनिया नहीं बदल सकते
अच्छा लिखा तब तक कोई नहीं पढेगा
जब तक तुम बाजार में सस्ते नहीं बिक सकते
बेहूदा लिखने से परहेज नहीं करना
अगर मंहगे में बिक सकते
मन की बात लिखने के लिए
अपनी महफ़िल अलग सजाएं
मस्तराम 'आवारा की तरह अकेले
रहने के लिए तैयार हो जाएं
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Monday, 25 February 2008

क्या करेंगे कागज़ पर पते लेकर-हिंदी शायरी

तेज आंधी ने उडाया तो
आंधी ने इंसान की आँखों में
घर बना लिया
वक्त के घुमते पहिये के साथ
जो पाँव से कुचला जाता है
वह उठकर सिर तक भी आ सकता है
उसने यह बता दिया
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घर से लेकर निकले थे
उनके नये घर का पता लेकर
गुम हो गया कागज़ रास्ते पर
भटकते रहे सड़कों पर और लौटे घर
सोचा-'नहीं मिला तो कोई बात नहीं
इस बार नहीं तो अगली बार मिलेंगे
दुबारा निकलेंगे पता लेकर'

सच है
इंसानों के पते होते हैं
पतों पर होते इंसान
अगर वह दिल में नहीं बसते
तो क्या करेंगे कागज़ पर पते लेकर

Sunday, 24 February 2008

उसे नहीं देख पाता कोई दिल-हिन्दी शायरी

जब बड़े लोगों के सजती है महफ़िल
तड़पते हैं छोटे लोगों के दिल
इंसानों में जब होता है अन्तर
तब कोई काम नहीं करता शांति का मंतर
देशों की जंग दिखती है
पर आदमी जो पल-पल लड़ता मन में
उसमें तो नैतिकता पिसती है
आर्थिक संपन्नता और विपन्नता के बीच
पलती है नफरत
उसे नहीं देख पाता कोई दिल
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आशिक ने कहा
''मैं तुम्हें चाहता हू
तुमसे लगा है मेरा दिल''
माशुका बोली
''क्या इतना सस्ता समझ रखा है
तभी मान सकती हूँ तुम्हें
पहले चुकाओं
साल भर तक
मेरे मोबाइल, मेकअप और मोटर का बिल''
आशिक गया हिल
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भरोसा और विज्ञापन-हिन्दी शायरी

अब भरोसा ढूँढने की चीज नहीं रही
टीवी चैनल और पत्र-पत्रिकाएँ
पढ़ते जाओ
ढेर सारी चीजें खरीदो
और भरोसे के साथ हो जाओ
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हमने जो उनसे कहा
''हम पर करो भरोसा
वक्त पर काम आयेंगे''
उन्होंने कहा
''आप वक्त पर किसी के काम आए
ऐसा क्या प्रमाण लाएंगे
हमने टीवी चैनल पर या अखबार में
कहीं आपका नाम नहीं देखा
आदमी के ख़ुद ने कहने से कुछ नहीं होता
उसका विज्ञापन होना भी जरूरी है
अगर ऐसा नहीं है तो
हम भी भरोसा कहाँ कर पायेंगे
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