Saturday, 23 February 2008

आदमी में विश्वास कहाँ है-हिन्दी शायरी

विश्वास टूटता कहाँ है
जो टूटता वह विश्वास कहाँ है
देने वाले ने काम के लिए दो हाथ
चलने के लिए दो पाँव
देखने के लिए आँखें
सुनने के लिए कान
सांस लेने के लिए नाक
विचार के लिए दी अक्ल
पर आदमी में विश्वास कहाँ है

आदमी अपने हाथ पेट पर लगाए बैठा रहता
पाँव उसी तरफ झुकाए
सुनता केवल उसके स्वर
सूंघता केवल अन्दर से नाक की तरफ
आती हुए भोजन की खुशबू
सोचता रहता पर रोटी भरने के लिए
फुरसत पाए तो सुस्ताते हुए जपता नाम
ढोल और शंख बजाकर चीखता
पर आदमी में विश्वास कहाँ है
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Friday, 22 February 2008

कलम की कोई मर्जी नहीं होती-हिन्दी शायरी

बंद कर दिए गुरुकुल
खोल लिए स्कूल
आसनों की जगह रख दिए स्टूल
नये ज़माने के चक्कर में
फैशन की टक्कर में
अपनी असलियत गए भूल
बेसहारा को सहारा नहीं दें
भूखे को खाना न दें
जिनसे किसी का पेट नहीं भरता
उन विषयों को देते तूल
कोई विषय न मिले तो
करते हैं जमाने के बिगड़ने और भटकने की
शिकायत करते
खुद का दोष जाते भूल
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पत्थर और कागज़ पर
लिखी कोई इबारत सच नहीं होती
लिखने वाले कोई फ़रिश्ते नहीं होते
और इंसानों से तो हमेशा भूल होती
डालर तो किसी इंसान को हीरा बना दो
रुपया दो तो किसी को भी सोना बना दो
कौडी देकर किसी को भी बोना बना दो
लिखने वाला जो चाहे लिख दे
कलम की कोई मर्जी नहीं होती
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Thursday, 21 February 2008

अपनों से अपनों पर करो राज-हिन्दी शायरी

एक कंपनी से हुए आजाद
पर फिर आ रहा है कंपनी राज
पहले तो विदेशी थी
चालाकी और छल कपट से आई
और पूरे देश पर छाई
लड़ने के लिए कई बहाने थे
क्योंकि थी पराई
पर कंपनी तो कंपनी ठहरी
अब अपनों के कई भेष धरकर आई
कहाँ और किससे शिकायत करोगे
कैसे करोगे लड़ाई
पहले था उसका नारा
''फ़ुट डालो और करो राज'
पर अब कंपनियों का नारा है
''अपने बनकर, अपनत्व से अपनों पर करो राज'
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कन्याओं की भ्रूण हत्याएं
इसी तरह होती रहीं
और बाजार के बिकने के
नये रिवाज के आने से
तो हो जायेगी प्रलय

बेटे के माँ-बाप अब कैसे
करेंगे अपने लाडले का बखान
कोई भी पूछ सकता है कि
''बताओ बाजार में इसकी
बोली कितनी लगी है
रिजर्व प्राइज कितनी बनी है'
क्या जवाब होगा उनका उस समय
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Tuesday, 19 February 2008

भरोसा-शायरी

किस पर कितना भरोसा करें
यह अक्सर सोचते
पर हम कितना भरोसे लायक हैं
इस सोच से मुहँ मोड़ते
भरोसा कोई पेड़ पर लटकी चीज नहीं
जो हर किसी को मिल जाये
भला वह फल कहाँ से आये
जिसका पेड़ हम खुद नहीं बोते
केवल पाने के लिए रोते
दूसरों की शिकायत खूब करते
पर हमने कभी सोचा है
कितनों का भरोसा हम तोड़ते
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Monday, 18 February 2008

अक्ल की कोई नहीं है गिनती- शायरी

जगह-जगह खुली हैं

लोगों को भरमाने के लिए दूकान

कोई चीज हाथ में नहीं मिलती

बस मोबाइल का बटन दबाते जाओ

अपनी पसंद के चेहरे के नाम पर मुहर लगाओ

कराओ खर्च करने वालों में गिनती

न पास की और न बात फेल की

चर्चा है हवा के खेल की

अक्ल से कोई वास्ता नहीं

उसकी तो कोई नहीं है गिनती

Sunday, 17 February 2008

मन है आवारा-शायरी

यूं तो हर आदमी है
जिन्दगी में अकेला आवारा
कितने बडे महल बना ले
अपनी आँगन में चाहे
जितने सुन्दर बाग़ सजा ले
मन तो उसका भटकता है
जैसे कोई हो बंजारा
कितनी भीड़ जुटा लेता है
लोग और सामानों की
भयभीत रहता है कि कहीं
हो न जाऊं अकेला
भागते-भागते जब थक जाता है
तब अपने को ही लगता है बिचारा
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फिर नही होंगे हादसे-हास्य कविता

यूं तो होते हैं हर रोज हादसे
वह इसलिए नजर आते
क्योंकि हम उनसे बचकर घर आ जाते
पर जब कोई हो जायेगा हमारे साथ
उठा ले जायेगा अपने हाथ
फिर नहीं दिखाई देंगे अपनी जिन्दगी में हादसे
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